अक्सर हम किसी को चेक देते समय उसे महज एक कागज का टुकड़ा समझ लेते हैं, लेकिन आपकी यही लापरवाही आपको सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है। क्या आप जानते हैं कि आपके खाते में कम बैलेंस या गलत हस्ताक्षर की वजह से अगर चेक रिजेक्ट (Bounce) हो गया, तो आप सीधे कानूनी पचड़े में फंस सकते हैं? भारत में चेक बाउंस होना कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि ‘Negotiable Instruments Act 1881’ के तहत यह एक गंभीर और दंडनीय अपराध है।
अदालत की चौखट और जेल का डर
अगर आपने किसी को पेमेंट के लिए चेक दिया और वह बैंक से वापस आ गया, तो बैंक सबसे पहले एक ‘रिटर्न मेमो’ जारी करता है। असली मुसीबत इसके बाद शुरू होती है। चेक पाने वाला व्यक्ति आपको 30 दिनों के अंदर कानूनी नोटिस भेज सकता है। यदि आपने नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर पैसे का इंतजाम नहीं किया, तो मामला सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंच जाएगा। कोर्ट में दोष सिद्ध होने पर आपको 2 साल तक की जेल काटनी पड़ सकती है। इतना ही नहीं, अदालत आप पर चेक की रकम का दोगुना जुर्माना भी लगा सकती है। यानी अगर 5 लाख का चेक बाउंस हुआ, तो आपको 10 लाख रुपये तक भरने पड़ सकते हैं।
सिबिल स्कोर होगा खराब, बैंक करेंगे ‘ब्लैक लिस्ट’
सजा और जुर्माने के अलावा भी इसके कई ऐसे नुकसान हैं जो आपकी आर्थिक कमर तोड़ सकते हैं। चेक बाउंस होने का सबसे बड़ा प्रहार आपके सिबिल (CIBIL) स्कोर पर पड़ता है। एक बार क्रेडिट स्कोर खराब हुआ, तो भविष्य में किसी भी बैंक से होम लोन, पर्सनल लोन या कार लोन लेना नामुमकिन हो जाएगा। बैंक अपनी साख बचाने के लिए बेहद सख्त कदम उठाते हैं; बार-बार ऐसी गलती करने पर बैंक आपका खाता फ्रीज कर सकता है और आपको नई चेकबुक जारी करने से भी पूरी तरह इनकार कर सकता है।
कानूनी पचड़े से बचने का ‘गोल्डन रूल’
कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बचने का सबसे सरल तरीका यह है कि जैसे ही आपको चेक बाउंस होने की खबर मिले, तुरंत सामने वाले पक्ष से संपर्क करें। कोशिश करें कि 15 दिनों की कानूनी मियाद खत्म होने से पहले ही आप भुगतान कर दें ताकि मामला कोर्ट तक न पहुंचे। चेक जारी करने से पहले हमेशा अपना बैंक बैलेंस जरूर चेक करें और हस्ताक्षर (Signature) वही करें जो बैंक के रिकॉर्ड में मौजूद हों। आपकी एक छोटी सी सावधानी आपको बड़े वित्तीय और कानूनी संकट से बचा सकती है।