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Kanth Vidhan Sabha: सिर्फ 1500 वोटों से जीतकर जब पीस पार्टी ने रच दिया था इतिहास, बड़े दलों के उड़ गए थे तोते

On: June 12, 2026 9:11 PM
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मुरादाबाद: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुरादाबाद जिले की विधानसभा सीट नंबर 25 यानी कांठ विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसा रोमांचक रहा है। साल 1957 में इस सीट पर हुए पहले चुनाव से लेकर 2022 के हालिया चुनावी दंगल तक, यहाँ की जनता ने कभी भी किसी एक राजनीतिक दल को हमेशा के लिए ‘स्थायी पट्टा’ नहीं दिया है। कंठ के वोटर्स का मिजाज हमेशा से ही बदलाव पसंद रहा है, जिसने समय-समय पर बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं के जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को पूरी तरह से ध्वस्त किया है। आइए एक नज़र डालते हैं कि पिछले सात दशकों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा और सपा के बीच यहाँ सत्ता का झूला किस तरह से झूलता रहा है।

कांग्रेस का शुरुआती दौर और क्षेत्रीय दलों का अचानक उभार

आजादी के बाद जब कंठ सीट पर चुनावी राजनीति की शुरुआत हुई, तो शुरुआती एक दशक तक यहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का ही एकतरफा बोलबाला रहा। साल 1957 में कांग्रेस के जितेंद्र प्रताप सिंह यहाँ के पहले विधायक चुने गए थे, जिसके बाद साल 1962 के चुनाव में भी दाउदयाल खन्ना ने कांग्रेस की इस जीत को बरकरार रखा। लेकिन, साल 1967 के चुनाव में ही कंठ के मतदाताओं ने अपनी असली फितरत दिखा दी। उन्होंने कांग्रेस को पूरी तरह से नकारते हुए एक निर्दलीय प्रत्याशी कुँवर जगत सिंह फरस्वाल को अपना नेता चुन लिया।

इसके बाद का दौर क्षेत्रीय अस्मिता और नए-नए राजनीतिक प्रयोगों का गवाह बना। साल 1969 में भारतीय क्रांति दल के नौ निहाल सिंह ने जीत दर्ज की, तो वहीं साल 1977 में आपातकाल के बाद आई प्रचंड जनता पार्टी की लहर में हरगोविंद सिंह यहाँ से विधानसभा पहुंचे। इसके बाद साल 1980 और 1985 के चुनावों में कांग्रेस ने राम किशन और समर पाल सिंह के जरिए आखिरी बार इस सीट पर वापसी की थी, लेकिन इसके बाद से कांग्रेस यहाँ दोबारा कभी मुख्य मुकाबले में भी नहीं आ सकी। फिर साल 1989 में राम मंदिर आंदोलन और मंडल कमीशन के दौर के ठीक पहले, जनता दल के चंद्र पाल सिंह ने यहाँ जीत का परचम लहराया था।

राम मंदिर आंदोलन के बीच भाजपा की एंट्री और भगवा रंग

नब्बे का दशक आते-आते उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीति राम मंदिर आंदोलन के केंद्र में आ चुकी थी, जिसका सीधा और बड़ा असर कंठ सीट पर भी देखने को मिला। साल 1991 के ऐतिहासिक और ध्रुवीकरण से भरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पहली बार इस सीट पर अपना खाता खोला और ठाकुर पाल सिंह यहाँ से विधायक चुने गए।

हालांकि, साल 1993 के मध्यावधि चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन और जनता पार्टी के प्रयोगों के बीच महबूब अली ने बाजी मार ली थी, लेकिन साल 1996 के चुनाव में भाजपा ने फिर से बेहद जोरदार वापसी की। इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर राजेश कुमार सिंह (चुन्नू) यहाँ से पहली बार विधायक बनकर उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे।

मायावती की सोशल इंजीनियरिंग और पीस पार्टी का हैरान करने वाला प्रयोग

साल 2002 का चुनाव कंठ विधानसभा के इतिहास में एक बिल्कुल नया टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। अपनी बेहतरीन सोशल इंजीनियरिंग के दम पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने यहाँ अपनी जमीन बेहद मजबूत कर ली। बसपा के रिजवान अहमद खान ने साल 2002 और फिर साल 2007 के चुनावों में लगातार दो बार जीत दर्ज की। कंठ के इतिहास में यह बेहद दुर्लभ और हैरान करने वाला वाकया था कि यहाँ की जनता ने किसी एक पार्टी या नेता को लगातार दो बार मौका दिया हो।

लेकिन जब साल 2012 का चुनाव आया, तो कंठ की जनता ने उत्तर प्रदेश के इतिहास का सबसे चौंकाने वाला फैसला सुनाकर सबको हैरान कर दिया। मुख्यधारा की बड़ी पार्टियों यानी सपा, बसपा और भाजपा को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए यहाँ के वोटर्स ने डॉ. अयूब की पीस पार्टी ऑफ इंडिया (PECP) के उम्मीदवार अनीसुर्रहमान को सिर-आंखों पर बिठा लिया। अनीसुर्रहमान ने महज 18.48% वोट पाकर बसपा के मजबूत नेता रिजवान अहमद खान को मात्र 1,534 वोटों के मामूली अंतर से हरा दिया था। यह चुनाव साफ दिखाता है कि कंठ का वोटर त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले में किस कदर अपनी चाल से बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर सकता है।

मोदी लहर बनाम अखिलेश यादव का दांव और 2022 का हाई-वोल्टेज ड्रामा

साल 2017 के चुनाव में जब पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचंड ‘मोदी लहर’ सवार थी, तब भाजपा ने अपने पुराने चेहरे राजेश कुमार सिंह पर दोबारा भरोसा जताया था। उस वक्त मुकाबला इतना कड़ा था कि आखिरी राउंड तक सबकी सांसें थमी हुई थीं। इस चुनाव में राजेश कुमार सिंह को 76,307 वोट मिले, जबकि पीस पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे अनीसुर्रहमान को 73,959 वोट मिले थे। भाजपा ने यह सीट महज 2,348 वोटों के बेहद करीबी अंतर से जीती थी।

इसके बाद साल 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने एक बड़ी रणनीतिक चाल चली। उन्होंने अमरोहा के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री कमल अख्तर को कंठ सीट से मैदान में उतार दिया, जिससे यहाँ का पूरा चुनावी समीकरण सपा के पक्ष में ध्रुवीकृत हो गया। नतीजा यह हुआ कि कमल अख्तर ने एकतरफा प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 1,34,692 वोट (49.19%) हासिल किए और भाजपा के मौजूदा विधायक राजेश कुमार सिंह को 43,178 वोटों के भारी-भरकम अंतर से शिकस्त दे दी। 2022 का यह नतीजा साफ करता है कि कंठ सीट पर सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) बहुत तेजी से काम करती है और यहाँ की जनता जितनी आसानी से किसी को सिर पर बिठाती है, उतनी ही तेजी से गद्दी से उतार भी देती है।

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