लखनऊ: उत्तर प्रदेश के गांवों की सरकार यानी पंचायत चुनाव को लेकर बड़ी खबर सामने आ रही है। अगर आप भी ग्राम प्रधान, बीडीसी या जिला पंचायत सदस्य के चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए है। मई 2026 में मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, लेकिन अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि चुनाव समय पर नहीं हो पाएंगे। विपक्ष जहां सरकार पर देरी का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार ने कोर्ट में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है।
हाईकोर्ट में सरकार का बड़ा खुलासा
पंचायत चुनाव की तारीखों को लेकर मचे घमासान के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। दरअसल, कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर मांग की गई थी कि प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का कार्यकाल 5 महीने पहले ही खत्म हो चुका है, इसलिए सरकार को इसे तुरंत गठित करने का निर्देश दिया जाए।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की बेंच के सामने राज्य सरकार ने हलफनामा दिया और बताया कि पंचायत चुनाव से पहले राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
क्यों टल सकते हैं चुनाव?
सरकार ने साफ कर दिया है कि पंचायत चुनावों में आरक्षण का निर्धारण पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही होगा।
- आयोग का गठन: सबसे पहले आयोग बनेगा, जिसमें समय लगेगा।
- सर्वे और रिपोर्ट: आयोग राज्यभर में सर्वे कर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।
- आरक्षण प्रक्रिया: रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि कौन सी सीट पिछड़ों के लिए आरक्षित होगी।
इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 4 से 6 महीने का समय लग सकता है। चूंकि पंचायतों का कार्यकाल मई 2026 में खत्म हो रहा है और अभी तक आयोग का गठन भी नहीं हुआ है, ऐसे में अप्रैल-मई में चुनाव होना लगभग असंभव नजर आ रहा है।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
चुनावों में होने वाली इस संभावित देरी को लेकर विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर चुनावों को टाल रही है क्योंकि वह जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ खोने से डर रही है। हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि बिना ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के चुनाव कराना सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले का उल्लंघन होगा, जिससे भविष्य में कानूनी अड़चनें आ सकती हैं।