नई दिल्ली/लखनऊ: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की अपुष्ट खबरों ने पूरी दुनिया में सनसनी फैला दी है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी भीषण तनाव के बीच आई इस खबर ने न केवल खाड़ी देशों को बल्कि भारत के कई हिस्सों को भी हिलाकर रख दिया है। कश्मीर की वादियों से लेकर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की गलियों तक, गम और गुस्से का सैलाब उमड़ पड़ा है।
सड़कों पर मातम और ‘मुर्दाबाद’ के नारे
श्रीनगर के ऐतिहासिक लाल चौक से लेकर लखनऊ के पुराने शिया बहुल इलाकों में माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है। प्रदर्शन के दौरान महिलाएं अपनी छाती पीटकर विलाप कर रही हैं और खामेनेई को कौम का ‘शेर’ बता रही हैं। प्रदर्शनकारियों में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ भारी आक्रोश है। सड़कों पर उमड़ी इस भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। लोग ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इजरायल धोखेबाज है’ जैसे नारे लगाते हुए अपना रोष प्रकट कर रहे हैं।
यूपी के बाराबंकी से है ईरान का ऐतिहासिक नाता
इस वैश्विक तनाव के बीच एक ऐसी सच्चाई सामने आई है जो हर भारतीय को हैरान कर देगी। क्या आप जानते हैं कि ईरान की इस्लामिक क्रांति के महानायक रूहुल्लाह खुमैनी और खामेनेई के गुरु का सीधा संबंध उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से है? जी हां, बाराबंकी के ‘किंतूर’ गांव की मिट्टी में खुमैनी के पूर्वजों की जड़ें दबी हुई हैं। इतिहास गवाह है कि खुमैनी के दादा, सैयद अहमद मूसवी मूल रूप से इसी गांव के रहने वाले थे।
सैयद अहमद ‘हिंदी’ का किंतूर से खुमैन तक का सफर
बाराबंकी की सिरौलीगौसपुर तहसील का किंतूर गांव आज एक बार फिर चर्चा में है। साल 1830 के आसपास, यहाँ के निवासी सैयद अहमद मूसवी धार्मिक यात्रा पर इराक गए थे। वहां से वे ईरान के ‘खुमैन’ शहर में जाकर बस गए। अपनी भारतीय विरासत और पहचान को संजोए रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ उपनाम जोड़ा था। आज भी ईरान के इतिहास में उन्हें ‘सैयद अहमद मूसवी हिंदी’ के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि जब भी ईरान में कोई संकट आता है, तो यूपी के इस छोटे से गांव की धड़कनें भी तेज हो जाती हैं।