अबुल कलाम अश्क
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की चुनावी बिसात बिछने में अभी करीब एक साल का वक्त बचा है, लेकिन सियासी गलियारों में टिकट के दावेदारों ने अभी से अपनी गोटियां सेट करनी शुरू कर दी हैं। आलम यह है कि जनता के बीच जाने से पहले नेता अपनी ही पार्टियों में सिंबल पाने के लिए ‘महाभारत’ लड़ रहे हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ही खेमों में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त ने हाईकमान की सिरदर्दी बढ़ा दी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार का मुकाबला सीधे तौर पर सपा और भाजपा के बीच सिमटने वाला है। इसी ‘दो तरफा’ चुनाव के आसार ने दावेदारों की बेचैनी बढ़ा दी है, जिससे हर कोई सही समय पर सही पाले में खड़े होने की जुगत में है।
सपा में ‘साइकिल’ की सवारी के लिए मची होड़, मुजाहिद अली की चर्चा तेज
अगर हम 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें, तो ठाकुरद्वारा से सपा के नवाब जान खां ने करीब 19 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार उनकी राह इतनी आसान नहीं दिख रही है। पार्टी के अंदर ही उन्हें कड़ी चुनौती मिल रही है।
सियासी हलकों में चर्चा है कि मुजाहिद अली सपा से अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। हालांकि मुजाहिद ने पिछला चुनाव बसपा के टिकट पर लड़ा था, लेकिन खबर है कि वह अब ‘साइकिल’ पर सवार होने की तैयारी में हैं। मुजाहिद के अलावा महमूद सैफी और सलाउद्दीन मंसूरी के नाम भी टिकट की दौड़ में तेजी से उछल रहे हैं, जिसने मौजूदा विधायक खेमे में हलचल पैदा कर दी है।
अखिलेश की ‘नई तकनीक’: सोशल मीडिया बनेगा टिकट का आधार
सपा में टिकट वितरण का तरीका अब बदल चुका है। पुराने दौर में मुलायम सिंह यादव (नेताजी) इलाके के बुजुर्गों और गणमान्य लोगों की राय को तवज्जो देते थे। लेकिन अखिलेश यादव के दौर में पार्टी ‘हाईटेक’ हो गई है।
बताया जा रहा है कि इस बार अखिलेश यादव सोशल मीडिया और डिजिटल मौजूदगी को टिकट का बड़ा आधार बना रहे हैं। हाईकमान यह बारीकी से देख रहा है कि किस दावेदार के फेसबुक और एक्स (ट्विटर) पर कितने फॉलोअर्स हैं और डिजिटल मीडिया पर उसकी पकड़ कैसी है। यानी अब ग्राउंड रिपोर्ट के साथ ‘डिजिटल रिपोर्ट कार्ड’ पर खरा उतरना भी अनिवार्य होगा।
भाजपा में ‘सहानुभूति’ बनाम ‘अनुभव’ का पेंच
भाजपा खेमे में भी टिकट के दावेदारों की लाइन बहुत लंबी है। पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे अजय प्रताप फिर से दावेदारी ठोक रहे हैं, तो वहीं अनुभवी राजपाल चौहान भी रेस में पीछे नहीं हैं।
इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व सांसद स्वर्गीय कुंवर सर्वेश की पत्नी साधना सिंह के नाम की हो रही है। माना जा रहा है कि भाजपा यहां ‘सहानुभूति कार्ड’ खेलकर मतदाताओं को एकजुट कर सकती है। भाजपा हाईकमान का रुख साफ है—पार्टी किसी बाहरी प्रत्याशी के बजाय उसी चेहरे पर दांव लगाएगी जिसकी पकड़ सोशल मीडिया से लेकर चौपालों तक मजबूत होगी।
‘लोकल’ चेहरों पर ही रहेगा पार्टियों का भरोसा
पार्टी सूत्रों की मानें तो सपा और भाजपा दोनों ने संकेत दे दिए हैं कि प्राथमिकता उन्हीं नेताओं को मिलेगी जो पिछले कुछ सालों से क्षेत्र की जनता के सुख-दुख में साथ रहे हैं। यही वजह है कि दावेदार अब खबरों में बने रहने के साथ-साथ जनता के बीच सक्रियता दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।
कुल मिलाकर, टिकट की यह दौड़ अब रैलियों से निकलकर स्मार्टफोन की स्क्रीन और हाईकमान के बंद कमरों तक पहुंच चुकी है। देखना होगा कि अखिलेश की डिजिटल कसौटी और भाजपा के जातीय समीकरणों में कौन बाजी मारता है।