उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट हमेशा से बेहद दिलचस्प और सियासी रूप से गर्म रही है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस सीट पर कमल खिलाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। संगठन धरातल पर पूरी तरह मुस्तैद था, चुनाव प्रचार के लिए बड़े-बड़े चेहरों को मैदान में उतारा गया और सबसे बड़ी बात यह रही कि पार्टी का वोट शेयर भी पिछली बार के मुकाबले काफी बढ़ गया। इसके बावजूद, चुनावी नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं रहे और समाजवादी पार्टी (SP) के नवाब जान ने करीब 20 हजार वोटों के एक बड़े अंतर से शानदार जीत दर्ज कर ली।
अब राजनीतिक गलियारों में असल सवाल यह उठ रहा है कि आखिर रणनीति में चूक कहां हुई? क्या बीजेपी की हार की मुख्य वजह उनका उम्मीदवार था, या फिर ठाकुरद्वारा के सामाजिक और सियासी समीकरण इतने मजबूत थे कि कोई भी दिग्गज यहां चुनावी नैया पार नहीं लगा सकता था? पिछले चुनावों के आंकड़े और मौजूदा जमीनी हकीकत इस सियासी पहेली का बहुत ही दिलचस्प जवाब देते हैं।
ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट पर क्या कहते हैं 2022 के आंकड़े?
सियासत में हर हार-जीत के पीछे अंकों का एक बड़ा खेल होता है। 2022 के चुनाव परिणामों पर बारीक नजर डालें तो पता चलता है कि सपा के नवाब जान को कुल 48.76% वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के अजय प्रताप सिंह 41.62% वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे। वहीं, कभी इस इलाके में मजबूत मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) महज 8.04% वोटों पर ही सिमट कर रह गई।
यहाँ सबसे गौर करने वाली बात यह है कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इस सीट पर 36.84% वोट मिले थे, जो 2022 में बढ़कर 41% के पार (लगभग 5% का इजाफा) पहुंच गए। स्थानीय राजनीतिक पंडितों के अनुसार, बीजेपी का जनाधार इस इलाके में कमजोर नहीं हुआ था, बल्कि उसने अपने पारंपरिक वोट बैंक में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की थी। इसके बावजूद हार का फासला 20 हजार वोटों का रहा, जिसने ‘उम्मीदवार बनाम सामाजिक समीकरण’ की बहस को हवा दे दी।
उम्मीदवार बनाम समीकरण: हार का असली विलेन कौन?
स्थानीय स्तर पर देखा जाए तो बीजेपी उम्मीदवार अजय प्रताप सिंह की छवि एक सक्रिय, युवा और जमीन से जुड़े नेता की रही है। चुनाव के दौरान पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व ने जमकर पसीना बहाया था। राजनीतिक जानकारों की मानें तो 2022 का यह चुनाव महज किसी एक चेहरे या उम्मीदवार के दम पर जीता जाने वाला चुनाव था ही नहीं। अगर हार का ठीकरा सिर्फ उम्मीदवार के सिर पर फोड़ना होता, तो पार्टी का वोट शेयर बढ़ने के बजाय घट जाता। लगभग 5% वोटों की बढ़ोतरी इस बात की गवाही देती है कि उम्मीदवार पूरी तरह से कमजोर फैक्टर नहीं था।
असल में, जीत-हार का पूरा खेल यहां के सामाजिक समीकरणों ने बिगाड़ा। 2022 के चुनाव में सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर मुस्लिम वोटों का एकतरफा ध्रुवीकरण रहा। साल 2012 तक ठाकुरद्वारा में मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस, बसपा, सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच बंटा रहता था। इसी बिखराव का फायदा उठाकर 2012 में बीजेपी के कुंवर सर्वेश कुमार ने जीत का परचम लहराया था, क्योंकि तब कांग्रेस और महान दल को 21-21% वोट मिले थे और सपा बेहद मामूली वोटों पर अटक गई थी।
लेकिन 2014 के उपचुनाव के बाद से हवा का रुख पूरी तरह बदलने लगा। 2022 आते-आते बसपा जमीन पर बेहद कमजोर पड़ गई, मायावती का कोर वोटर भी छिटका और ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) कोई खास असर नहीं छोड़ पाई। नतीजतन, बीजेपी को रोकने की होड़ में पूरा मुस्लिम वोट बैंक एकमुश्त होकर समाजवादी पार्टी के पाले में चला गया। यही मुख्य कारण रहा कि सपा के नवाब जान का वोट शेयर छलांग लगाकर सीधे 49% के करीब पहुंच गया।
2027 के लिए क्या है बीजेपी का नया मास्टरस्ट्रोक?
हालांकि, यह सच है कि वोटों का यह एकतरफा ध्रुवीकरण हार की सबसे बड़ी वजह था, लेकिन स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत भूमिका को भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता। ठाकुरद्वारा जैसी संवेदनशील और गणितीय सीटों पर उम्मीदवार की निजी पकड़, उसकी बिरादरी का नेटवर्क और जनता से सीधा संपर्क हार-जीत में 3 से 4 प्रतिशत वोटों का बड़ा उलटफेर करने की क्षमता रखता है। सपा के नवाब जान की यही व्यक्तिगत और पुरानी पकड़ उनके काम आई।
अब बीजेपी आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करती दिख रही है। फिलहाल पार्टी के भीतर टिकट के लिए अमित चौहान और अजय प्रताप सिंह को प्रमुख दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। ये दोनों ही नेता अब सिर्फ अपने पारंपरिक हिंदू वोट बैंक के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे हैं। दोनों ने ही मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध वर्ग, व्यापारियों और स्थानीय युवाओं के बीच अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी है। इलाके के सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक आयोजनों में इनकी लगातार मौजूदगी यह साफ बयां कर रही है कि बीजेपी इस बार ठाकुरद्वारा के सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए हर मुमकिन कोशिश में जुट गई है।