लखनऊ: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आहट तेज हो गई है। राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने अपनी ओर से कमर कसते हुए जमीनी स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। राज्य के सभी 75 जिलों में मतपत्र (Ballot Papers) भेजने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हो गया है। आयोग का लक्ष्य करीब 60 करोड़ मतपत्रों को समय से जिलों में पहुंचाना है। हालांकि, इन प्रशासनिक तैयारियों के बीच ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) का मुद्दा एक बार फिर चुनाव की तारीखों पर भारी पड़ता दिख रहा है।
मतदाता सूची और मतपत्रों पर काम तेज
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतपत्रों की संख्या बहुत अधिक होने और उन्हें सुरक्षित तरीके से जनपदों तक पहुंचाने में समय लगता है, इसलिए यह प्रक्रिया अभी से शुरू कर दी गई है। इसके साथ ही मतदाता पुनरीक्षण (Voter List Revision) का काम भी आखिरी चरण में है। आयोग पहली ड्राफ्ट लिस्ट जारी कर चुका है और फिलहाल लोगों के दावों और आपत्तियों का निपटारा किया जा रहा है। 28 मार्च को आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
ओबीसी आयोग का गठन और तारीखों का सस्पेंस
प्रशासनिक अमला भले ही एक्टिव हो, लेकिन चुनाव की वास्तविक तारीखों का एलान अभी भी अधर में लटका है। इसकी सबसे बड़ी वजह है ‘समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ का अब तक गठित न होना। जब तक आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण तय नहीं हो जाता, तब तक चुनाव की अधिसूचना जारी होना मुश्किल है। निर्वाचन आयोग के अधिकारियों का कहना है कि वे अपनी प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं, ताकि जैसे ही शासन की ओर से हरी झंडी मिले और आयोग का गठन हो, वे तुरंत चुनाव संपन्न करा सकें।
हाईकोर्ट में 4 फरवरी को बड़ी सुनवाई
पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ तक पहुंच चुका है। स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) में मांग की गई है कि पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आयोग के गठन की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश राज्य सरकार को दिए जाएं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानूनन बिना पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के सीटों का आरक्षण तय नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले को 4 फरवरी के लिए सूचीबद्ध किया है।