वॉशिंगटन/कोपेनहेगन: दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका और उसके नाटो (NATO) सहयोगी डेनमार्क के बीच तनाव अब चरम पर पहुँच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे या उसे खरीदने की ज़िद के बीच डेनमार्क ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। सीएनएन (CNN) की एक रिपोर्ट के अनुसार, डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई भी विदेशी ताकत उनके इलाके में घुसपैठ की कोशिश करती है, तो उनके सैनिक बिना किसी सीनियर अधिकारी के आदेश का इंतज़ार किए सीधे फायरिंग शुरू कर देंगे।
74 साल पुराना नियम बना ट्रंप के लिए ढाल
डेनमार्क ने जिस ‘शूट ऑन साइट’ (Shoot on Sight) नियम का हवाला दिया है, वह कोई नया फरमान नहीं बल्कि 1952 का एक पुराना सैन्य नियम है। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान बनाए गए इस नियम के मुताबिक, यदि डेनमार्क या उसके अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों पर हमला होता है, तो सैनिकों को ‘पहले हमला करने और बाद में सवाल पूछने’ की शक्ति दी गई है। यानी युद्ध जैसी स्थिति में उन्हें कोपेनहेगन से किसी राजनीतिक मंजूरी या फॉर्मल ऑर्डर का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं होगी।
1940 की उस कड़वी याद ने बदला कानून
डेनमार्क ने यह सख्त नियम एक ऐतिहासिक सबक के बाद बनाया था। दरअसल, 1940 में जब नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला किया था, तब कम्युनिकेशन सिस्टम पूरी तरह ठप हो गया था। उस समय डेनमार्क के सैनिक इस दुविधा में थे कि उन्हें लड़ना है या आदेश का इंतज़ार करना है। इसी भ्रम की वजह से जर्मनी ने आसानी से कब्जा कर लिया था। अब रक्षा मंत्रालय का कहना है कि वे इतिहास को दोहराने नहीं देंगे और किसी भी देश—चाहे वह अमेरिका ही क्यों न हो—की सैन्य कार्रवाई का तुरंत जवाब दिया जाएगा।
क्यों मची है ग्रीनलैंड के लिए होड़?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो अटलांटिक महासागर में स्थित है। पिछले 300 सालों से यह डेनमार्क का हिस्सा है, जिसकी रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क ही संभालता है। राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति और वहां मौजूद खनिज भंडार अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘अति आवश्यक’ हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया है कि अगर प्यार से बात नहीं बनी, तो सैन्य विकल्प भी हमेशा मेज पर है। हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने दो-टूक कह दिया है कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।”