नई दिल्ली: देश भर के मुस्लिम समुदाय के लिए एक बेहद बड़ी और पाक खबर सामने आ रही है। इस्लाम धर्म का बेहद पवित्र और अहम त्योहार माना जाने वाला ईद अल-अज़हा (بقر عيد) यानी बकरीद की तारीख तय हो गई है। भारत में आज जिलहिज्जा का पाक चांद नजर आ गया है, जिसके बाद अब देश में ईद अल-अज़हा का पर्व 28 मई 2026, गुरुवार को पूरे अकीदत और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व हर वर्ष 12वें महीने यानी जुलहिज्जा की दसवीं तारीख को पारंपरिक रूप से मनाया जाता है।
तीन दिन तक दी जाएगी कुर्बानी, जानिए गोश्त बांटने का क्या है खास नियम
ईद अल-अज़हा के मौके पर अल्लाह की राह में कुर्बानी देने का एक खास और बड़ा महत्व होता है। इस साल 28 मई से लेकर 30 मई तक लगातार तीन दिनों तक कुर्बानी का यह पवित्र सिलसिला जारी रहेगा। ईद की खास नमाज अदा करने के तुरंत बाद से ही कुर्बानी का दौर शुरू हो जाएगा।
इस्लामिक परंपरा के अनुसार, कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का नियम है, जो इस प्रकार है:
- पहला हिस्सा: समाज के गरीब, बेसहारा और जरूरतमंद लोगों के लिए।
- दूसरा हिस्सा: अपने सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए।
- तीसरा हिस्सा: खुद के परिवार के इस्तेमाल के लिए रखा जाता है।
आखिर क्यों दी जाती है कुर्बानी? जानिए इसके पीछे का बेहद भावुक इतिहास
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के बेहद नेक और चहेते पैगंबर थे। उन्हें काफी लंबी मन्नत और वक्त के बाद बेटे के रूप में इस्माइल अलैहिस्सलाम की प्राप्ति हुई थी, यही वजह थी कि वह अपने बेटे से बेपनाह मोहब्बत करते थे। एक दिन अल्लाह ने हजरत इब्राहीम के गहरे ईमान की परीक्षा लेने का फैसला किया।
हजरत इब्राहीम को रात में ख्वाब आया जिसमें उन्हें अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म मिला। बहुत सोचने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि दुनिया में उनके लिए सबसे प्यारी चीज उनका बेटा इस्माइल ही है। अल्लाह के इस कड़े हुक्म को शिरोधार्य करते हुए उन्होंने भारी मन से अपने जिगर के टुकड़े की कुर्बानी देने का अटूट फैसला कर लिया।
जब हजरत इब्राहीम अपने बेटे को लेकर मीना के मैदान की तरफ कुर्बानी देने जा रहे थे, तब रास्ते में शैतान ने उन्हें बहकाने और इरादा बदलने की भरपूर कोशिश की। उनसे कहा गया कि मासूम बेटे की जगह किसी जानवर की कुर्बानी दे दें, लेकिन हजरत इब्राहीम ने इसे अल्लाह के हुक्म के साथ धोखा माना और अपने फैसले पर अडिग रहे। जब उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई, तो उनकी इस सच्ची नीयत, बेमिसाल त्याग और अल्लाह पर अटूट भरोसे से खुश होकर अल्लाह ने उनके बेटे की जान सलामत रखी और उसकी जगह जन्नत से भेजे गए एक दुंबे (जानवर) को तब्दील कर दिया। बस इसी ऐतिहासिक और पवित्र घटना की याद में तब से लेकर आज तक दुनिया भर में बकरीद पर कुर्बानी देने की यह महान परंपरा चली आ रही है।
उलेमाओं की बड़ी अपील: सादगी से मनाएं त्योहार, साफ-सफाई का रखें विशेष ध्यान
त्योहार को लेकर देश भर के बाजारों में रौनक अचानक से बढ़ गई है और लोग खरीदारी में जुट गए हैं। इसी बीच तमाम धार्मिक गुरुओं और उलेमाओं ने आम अवाम से पुरजोर अपील की है कि ईद का यह पावन त्योहार पूरी सादगी, आपसी अमन-चैन और भाईचारे के साथ मनाएं। इसके साथ ही, इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि कुर्बानी के दौरान और उसके बाद अपने आस-पास साफ-सफाई का सबसे ज्यादा और खास ध्यान रखें ताकि किसी को भी कोई असुविधा न हो।