सावधान! हर हफ्ते एक ‘क्रेडिट कार्ड’ जितना प्लास्टिक खा रहे हैं आप, फेफड़ों को बचाने के लिए आयुर्वेद ने खोजा जादुई इलाज
हरिद्वार: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्लास्टिक की बोतल से आप पानी पीते हैं या जिस पैकेट से चिप्स खाते हैं, वह आपके शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है? ताज़ा रिसर्च ने एक डरावना खुलासा किया है। हम अनजाने में ही सही, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हर हफ्ते लगभग एक क्रेडिट कार्ड के वजन जितना प्लास्टिक अपने शरीर के अंदर ले जा रहे हैं। यह ज़हर अब हमारे खून, प्लाज्मा और यहाँ तक कि गर्भ में पल रहे बच्चे तक पहुँच चुका है। लेकिन घबराने की ज़रूरत नहीं है, पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने इस आधुनिक समस्या का एक प्राचीन समाधान खोज निकाला है।
क्या है माइक्रोप्लास्टिक और यह कितना खतरनाक है?
माइक्रोप्लास्टिक वे छोटे कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। कई बार तो ये 10 माइक्रोन से भी छोटे होते हैं—यानी एक सरसों के दाने से भी हज़ारों गुना छोटे। ये कण हवा, पानी और भोजन के ज़रिए हमारे शरीर में घुस जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्लास्टिक हमारे फेफड़ों में जमा होकर ‘फाइब्रोसिस’ जैसी खतरनाक बीमारी पैदा कर रहा है, जिससे फेफड़ों की कोशिकाएं पत्थर की तरह कठोर हो जाती हैं और सांस लेना दूभर हो जाता है।
हमारी 2400 किमी लंबी श्वसन प्रणाली पर हमला
हमारी श्वसन प्रणाली (नाक, गला, श्वास नली और फेफड़े) लगभग 2400 किलोमीटर लंबी है। जब हम सांस लेते हैं, तो ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के सबसे निचले हिस्से ‘एल्विओलाई’ तक पहुँच जाते हैं। यहाँ ये ऑक्सीजन के प्रवाह को रोकते हैं और सूजन पैदा करते हैं। 2022 में हुए एक बड़े शोध ने जब यह साबित किया कि माइक्रोप्लास्टिक फेफड़ों की गहराई तक धँस चुका है, तब पतंजलि के वैज्ञानिकों ने इस पर काम शुरू किया।
पतंजलि की ‘ब्रोन्कोम’: फेफड़ों के लिए संजीवनी!
पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने एक साल के गहन अध्ययन के बाद ‘ब्रोन्कोम’ (Bronchom) नामक आयुर्वेदिक औषधि विकसित की है। चूहों पर किए गए परीक्षणों में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आए फेफड़ों को जब ‘ब्रोन्कोम’ की डोज़ दी गई, तो उनकी कार्यक्षमता फिर से बहाल होने लगी।
[Image: Patanjali Research Institute scientists testing Bronchom on respiratory models]
वैज्ञानिक परीक्षणों में मिली बड़ी सफलता
शोध के दौरान ‘Flexivent System’ मशीन का उपयोग किया गया, जिसने यह साबित किया कि ब्रोन्कोम फेफड़ों की सूजन को कम करने में असरदार है। जांच में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक की वजह से शरीर में जो सूजन वाले जीन (IL-6, IL-8) बढ़ गए थे, ब्रोन्कोम के सेवन से वे वापस सामान्य स्तर पर आ गए। हिस्टोपैथोलॉजी (ऊतकों की जांच) में यह भी दिखा कि क्षतिग्रस्त वायु मार्ग फिर से स्वस्थ हो रहे हैं और फेफड़ों की लचीलापन वापस लौट रही है।
निष्कर्ष: आयुर्वेद से आधुनिक संकट का अंत
आज के दौर में जब प्लास्टिक से बचना लगभग नामुमकिन है, तब पतंजलि का यह शोध आयुर्वेद की वैज्ञानिक शक्ति को दुनिया के सामने रखता है। ‘ब्रोन्कोम’ न केवल फेफड़ों की सफाई करती है, बल्कि उन्हें माइक्रोप्लास्टिक जैसे अदृश्य दुश्मनों से लड़ने के लिए सशक्त भी बनाती है। यह रिसर्च साबित करती है कि अगर सही समर्पण हो, तो प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति हर आधुनिक लाइलाज बीमारी का जवाब दे सकती है।